3.राजा नंदूक
चौहान वंशीय पृथ्वीराज
तृतीय(1172-92) द्वारा चंदेल वंशीय परमल या परमर्दि (1165-1203ईस्वी) के हराए जाने
के पूर्व जो शासक महोबा पर शासन करते थे उनका वर्णन एम ए शेयरियंग ने निम्न प्रकार
किया है।
1. राजा सूरज ब्रह्म
2. राजा नल घोख – अवध गजेटियर, भाग दो, (1877), पृष्ट 512 के
अनुसार राजा नल भर जाती का शासक था जो नगरम पर राज करता था। यह राजा 1030 ईस्वी मे
सैयद सलार द्वारा पराजित किया गया था।
3. राजा कोल ब्रह्म
4. राजा काल ब्रह्म
5. रणजीत ब्रह्म
6. पूरण ब्रह्म
7. चितुर ब्रह्म
8. राजा बजरंग देव
9. राजा हरंग देव
10.
राजा परमल ब्रह्म- इंडियन एंटीक्यरी , भाग एक (1872),
पृष्ट 266 के अनुसार परमल ब्रह्म ने
मालिका के सहयोग से चंदेल कांश की स्थापना किया।
चंदेल वंश के रजाओं
(पूर्ववर्ती या परिवर्ती) के नामो से भर राजाओ के नामो मे विलक्षण समानता पायी
जाती है। यही नही भर , राजभर, भरपतवा, भरिया इत्यादि मे चंदेल राजाओ के पूजने की
आज भी प्रथा प्रचलित है। अगोरी के चंदेल वंशी शासक दुल्हादेव (hindu tribes and
casted, vol I P 183, by m.a. sherring) कि पुजा भरिया जाती के लोग आज भी करते है
व अपना कुलदेवता माने है (the tribes castes of the central province of india
vol, II, page 247 by r.v. russell) भर जाती मे काल भैरव, दल
देव, बल देव, भारिमल, पारिमल, कारे देव इत्यादि कुल देवताओ की पुजा होती
है। जबकि राजा भारी माल, नारायण देव,
हरी देव, उरण देव, दूल्हा देव, दरक देव, राजमल देव, राजधर
देव, धरया देव एवं धन्यू इत्यादि राजा चंदेल वंश से संबन्धित
बताए जाते है। प्रसिद्ध इतिहास वेत्ता हामिल्टन (1819 ईस्वी) मानते है की “देव” शब्द से उपाधि प्रपट अधिकतर शादक भर जाती से संबन्धित थे। भर जाती मे
सुहेल देव, असिल देव, बिसल देव, दल देव, बल, देव, नैन्या देव, माणिक देव,
इत्यादि अनेक राजा हुये है। भर जाती के इन शासको के नामो की उपाधियों मे, चंदेल वंश के शासको की उपाधियों मे अधिक समानता है। अतः भर जाती से चंदेल
जाती की दूरी अधिक नहीं दिखाई देती है।
उक्त विवरण से नन्हुका को भर
जाती से संबधित सिद्ध करने मे मुझे किसी प्रकार की कठिनाई नहीं है। पर विंडंबना का
विषय है की हिन्दी मे जो इतिहास की पुस्तके विश्वविध्यालयों द्वारा स्वीकृत की गयी
है। उसमे “भर” को “भार” से उच्चरित किया गया है। हिन्दी मे इतिहास लिखनेवाले हमारे
देश के इतिहासकर यदि अंग्रेज़ो से भी हिन्दी सीख लिया होता तो भी कोई कठिनाई नहीं
आनी चाहिए थी। हेन्री इलियुयात ने तो शब्दो का हिन्दी उच्चार्ण भी सिखाया है-(देखे
supplement to the glossary of indian terms, vol I (1845), P.71), जहा BHUR भर BHAR स्पष्ट
रूप से लिखा गया है।
BHURPUTWA भरपतुआ BHARPATWA (a subdivision of bhur tribe- G.V.
see also gurhwar)
भर शब्द या जाती को भार जाती
से उच्चरित करना उनके इतिहास को बिगाड़ना है। जो अत्यंत ही खेद जनक है।
अनेक एटिहासिक तथ्य इस दिशा
की ओर संकेत करते है की नर्मदा से लेकर लोवर दोआब तक भरो का र्ज्या फैला हुआ था।
मध्य प्रदेश का उत्तरी भाग तथा उत्तर प्रदेश का दक्षिणी भाग भरो के राज्य-विस्तार
मे समाहित था। बांदा जिले के विषय मे एम ए शेयरिंग ने कहा है “in the district of Banda, on its eastern side are
extensive hill forts, which dr. wilton oldam, formerly assistant magistrate of
that district, informs me are of cyclopaean dimensions, and are attributed to
the bhars. In particular, he mentions lukwa situated in the chibu pergannah.”{HINDU TRIBES AND CASTES 1872 VOL.
I PAGE. 257 BY M.A. SHERRING}
“ बांदा जिले मे, इसके पूर्वी तरफ, विस्तृत पहाड़ी दुर्ग है। जिसे उस
जिले के भूतपूर्व सहायक न्यायाधीश डाक्टर विल्टन ओल्धम ने मुझे सूचित किया की वे
विस्तृत परिमाण मे है और भरो के गुण विशेष को दर्शाते है,
चिबु परगना मे स्थित लुकवा को वे विशेष तौर पर दर्शाते है”
वर्तमान मिर्जापुर नगर से
लगभग पाँच मिल दूरी पर पश्चिम की ओर भरो की राजधानी ठो। इस राजधानी का प्राचीन नाम
अभी तक अज्ञात है। पांपपुर नाम राजपूतो ने दिया है। जो इस क्षेत्र को विजिट करे के
बाद रखे। मिर्जापुर जिले की विंध्यवासिनी भरो की देवी मानी जाती है। जिसका वर्णन
पुराणो मे भी मिलता है। इलाहाबाद का भर शासक लिली यहा की प्रयत्लतम शासक हुआ। पर
उसका समय काल निर्धारण दुष्कर जान पड़ता है।
अब हम इस निष्कर्ष पर पाहुचते
है की चंदेल वंश की संस्थापक भर जाती थी। और इसी भर जाती मे नन्दुक नामक भर शासक
से चंदेल वन्श की परंपरा चली जो कालांतर मे राजपूत काही गयी।
चंदेलों की देवी मनिया देवी
मानी जाती है। ये देवी प्राचीन समय से ही भरो
और गोण्डो मे समान रूप से पुजी जाती थी। मनिया देवी का मंदिर केन नदी के
तटपर प्राचीन मनीयगढ़ के भग्नदुर्ग मे आज भी है। इस देवी का दूसरा मंदिर हमीरपुर
जिले के भारेल नमक गाँव मे स्थित है। यह भारेल नामक गाँव भरो का केंद्र रहा है।
मनिया देवो की समान रूप से चंदेलों, गोण्डो और भरो मे उपासना यह दर्शाती है की इन जातियो की कुल देवी एक ठो।
अतः इन जातियो के परसत्पर संबंध थे। ये संबंध शादी विवाह के रूप मे सोहवि शताब्दी
तक चलते रहे।
महाकवि चंदरबरदाई रासो मे
लिखा है की चन्द(नन्दुक) 12 घनदे से कुछ अधिक समय मे सिहोरा और गहोरा को जीतकर
असंख्य घोड़े, गाय, बैल लूटकर कलिंजर वापस चला गया।
भर/राजभर
साम्राज्य पुस्तक से लिया गया
देखे- पृष्ट संख्या –133 से 139
लेखक श्री मग्गूराम बंगल राजभर
देखे- पृष्ट संख्या –133 से 139
लेखक श्री मग्गूराम बंगल राजभर
(MR. M.B. RAJBHAR)
{राजभर रत्न)
।
।
।
टाइप्ड एंड पोस्टेड बाई
भरतवंशी कैलाश नाथ
राय (राजभर)
3 Comments
Great sir
ReplyDeleteit is a very short summary . You define
ReplyDeleteMore.
Great Sir Ji Jai Ho Maharaja Suheldev Rajbhar Ji Jai Rajbhar छत्रिय Samaj
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