राजभर इंसान की एक श्रेणी है। प्राचीनकाल मे इनके वंश मे काफी बलशाली, धर्मात्मा एवं विदेशी आक्रमणकारी आततायियों के दांत खट्टा करने, एवं उन्हें उन्ही की भाषा समझा कर उनके देश मरे हुये हालत मे भेजने वाला राजा पैदा हुए। राहुल सांकृतायन की पुस्तक सप्तमी के बच्चे के अनुसार राजभर भरत कुल के है, सिन्धु घाटी की सभ्यता भरो के पुर्वजो की देन है। डीह बाबा भरो के ही पूर्वज है। अमॄतलाल नागर की पुस्तक गदर के फूल के अनुसार राजभर भरतवंशी है है, इनके पूर्वज सीतापुर मे नैमिषारण महोत्सव संतो के लिए आयोजित किये थे। यह नैमिषारण महोत्सव पांडव आयोजित किये थे । मछली मार की कहावत से राजभर अर्जुन कुल के है। बनारस मे राजभरो के क ई गांव का नाम व्यासपुर होने से प्रमाणित हो या है कि राजभर पांडव कुल के है। इनके वंश मे पुरू दुष्यंत, भरत, संवरण, कुरू, दिवरथ, भीष्म, शान्तनु, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, अभिमन्यु, परीक्षित, जनमेजय, निचक्षु, उदयन दण्पाणि वीरसेन, विक्रमादित्य, भर्तृहरि, चन्द्र गुप्त विक्रमादित्य, सुहेलदेव, छत्रसाल आदि अनगिनत बहादुर व धार्मिक राजा पैदा हुए थे। राजभर के पूर्वज न केवल भारत की रक्षा करते थे, अपितु जनता की भूख मिटाने व देश को सोना आदि जवाहरात से माला माल करने का भी काम किये थे।
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